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अक्टूबर 10, 2012

लगाव



जौर (ज़ुल्म) से बाज़ आयें पर बाज़ आएँ क्या 
कहते हैं हम तुमको मुँह दिखलायें क्या,

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ
हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या, 

लाग (दुश्मनी) हो तो उसको हम समझे लगाव 
जब न हो कुछ तो धोखा खाएँ क्या,

हो लिए क्यूँ नामाबर (डाकिये) के साथ साथ 
या रब ! अपने ख़त को हम पहुँचाएँ क्या,

मौज-ए-खूँ (खून कि लहर) सर से गुज़र ही क्यूँ न जाए
आस्तान-ए-यार (माशूक कि चौखट) से उठ जाएँ क्या, 

उम्र भर देखा किए मरने कि राह
मर गए पर देखिये दिखलाएँ क्या,

पूछते हैं वो कि "ग़ालिब" कौन है ?
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या,  



सितंबर 25, 2012

क़त्ल



दोस्त ग़मख्वारी (दुःख) में मेरी सई (मदद) फरमाएंगे क्या?
ज़ख्म के भरने तलक नाख़ून न बढ़ जायेंगे क्या?

बेनियाज़ी (तकलीफ) हद से गुज़री बंदापरवर, कब तलक? 
हम कहेंगे हाल-ए-दिल, और आप फरमाएंगे 'क्या'?

हज़रत -ए-नासेह (उपदेशक) गर आयें दीद-ओ-दिल फर्श-ए-राह (क़दमों में पलकें) 
कोई मुझको यह तो समझा दो, कि समझायेंगे क्या?

आज वाँ तेग-ओ-कफ़न (तलवार और कफ़न) बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज्र (ऐतराज़) मेरे क़त्ल में, वो अब लायेंगे क्या?

गर किया नासेह ने हमको क़ैद, अच्छा यूँ ही सही 
ये जूनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छूट जाएगें क्या?

खाना जाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं (जुल्फों के बंदी), ज़ंजीर से भागेंगे क्यूँ 
है गिरफ्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां (कैदखाने) से घबराएंगे क्या?

है अब इस मामूरे (बस्ती) में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फत (इश्क़ का आकाल)
हमने यह माना, कि दिल्ली में रहेंगे, खायेंगे क्या?  

सितंबर 07, 2012

निकम्मा



गैर लें महफ़िल में बोसे (चुम्बन) जाम के 
हम रहे यूँ तिशना लब (प्यासे) पैगाम के,

खस्तगी (बर्बादी) का तुमसे क्या शिकवा कि ये
हथकंडे हैं चर्खे-ए-नीली फाम (नीले आसमान) के,

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के

रात पी ज़मज़म (पाक पानी) और मय सुबहदम (सुबह)
धोये धब्बे जाम-ए-अहराम (हज के पाक कपड़े) के,

दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हलके (धागे) हैं तुम्हारे दाम (जाल) के,

शाह (बादशाह) के है गुस्ल-ए-सेहत की खबर
देखिये दिन कब फिरें हम्माम (गुस्लखाना) के,

इश्क ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया 
वरना हम भी आदमी थे काम के, 

अगस्त 17, 2012

आतिश



नुक्ताचीं (गलती निकलना) है गम-ए-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात, जहाँ बात बनाए न बने,

मैं बुलाता तो हूँ उसको, मगर ए ! जज्बा-ए-दिल 
उस पे बन जाये कुछ ऐसी की बिन आए न बने,

खेल समझा हैं कहीं छोड़ न दे, भूल न जाए
काश ! यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने,

ग़ैर फिरता है लिए यूँ तेरे ख़त को, कि अगर 
कोई पूछे, कि क्या है ये ? तो छुपाए न बने,

इस नज़ाकत का बुरा हो, वो भले हैं, तो क्या?
हाथ आएं, तो उन्हें हाथ लगाए न बने,

कह सके कौन कि ये जलवागीरी किसकी है?
पर्दा छोड़ा है वो उसने, कि उठाये न बने,

मौत कि राह न देखूँ, कि बिन आए न रहे
तुमको चाहूँ कि न आओ तो बुलाए न बने,

बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न बने
काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने,

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने,

जुलाई 19, 2012

उम्मीद



कोई उम्मीद बर (पूरी) नहीं आती 
कोई सूरत नज़र नहीं आती, 

मौत का एक दिन मु'अय्यन (मुक़र्रर) है 
नींद क्यूँ फिर रात भर नहीं आती, 

आगे (पहले) आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी 
अब किसी बात पर नहीं आती,

जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद (इबादत की ताक़त)
पर तबीयत इधर नहीं आती,

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ 
वर्ना क्या बात कर नहीं आती, 

क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं 
मेरी आवाज़ गर नहीं आती, 

दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता 
बू भी ए ! चारागर (हकीम) नहीं आती,

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी 
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती,

मरते हैं आरज़ू में मरने की 
मौत आती है पर नहीं आती,

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' 
शर्म तुमको मगर नहीं आती,