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फ़रवरी 18, 2013

क़यामत



नहीं कि मुझको क़यामत का एतिकाद (यकीन) नहीं
शब-ए-फिराक (विरह कि रात) से रोज़-ए-जज़ा (क़यामत) ज्यादा  नहीं,

कोई कहे कि शब-ए-मह (चाँदनी रात) में क्या बुराई है
बला से आज अगर दिन को अब्र-ओ-बाद (सुहानी घटा) नहीं,

जो आऊँ सामने उनके तो मरहबा (स्वागत) न कहें 
जो जाऊँ वहाँ से कहीं को तो खैरबाद (विदाई) नहीं,

कभी जो याद भी आता हूँ मैं, तो कहते हैं कि 
आज बज़्म में कुछ फ़ित्न-ओ-फिसाद (लड़ाई-झगड़ा) नहीं,    
     
आलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब 
गदा-ए-कूचा-ए-मयखाना नामुराद (मयखाने का भिखारी) नहीं,

जहाँ में हैं गम-ओ-शाद बहम (साथ) हमे क्या काम 
दिया है हमको खुदा ने वो दिल कि शाद (खुश) नहीं,

तुम उनके वादे का ज़िक्र उनसे क्यूँ करों 'ग़ालिब'
ये क्या कि तुम कहो, और वो कहें कि याद नहीं,  
  

जनवरी 23, 2013

ये भी न सही


न हुई ग़र मेरे मरने से तसल्ली, न सही 
इम्तिहाँ और भी बाकि हों, तो ये भी न सही,

खार-ए-आलम-ए-हसरत-ए-दीदार (काँटों भरे रास्ते पर दीदार की हसरत) तो है
शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली (सब्र के गुलिस्ताँ के फूल) न सही,

मयपरस्तों ! (शराबियों) खुम-ए-मय (शराब का घूँट) मुँह से लगाये ही बनी 
एक दिन ग़र न हुआ बज़्म (महफ़िल) में साक़ी न सही 

नफ़स-ए-कैस (मजनूँ की साँस) की है चश्मा-ओ-चराग-ए-सहरा (रेगिस्तान का तालाब)
ग़र नहीं शमा-ए-सियाहखाना-ए-लैला (लैला के अँधेरे घर की शमा) न सही,

एक हंगामे पर मौक़ूफ़ (बंद) है घर की रौनक 
नौह-ए-गम (मातम) ही सही, नगमा-ए-शादी न सही,

न सिताइश (तारीफ) की तमन्ना, न सिले (इनाम) की परवाह
ग़र नहीं है मेरे अशआर (शेरों) में मानी (अर्थ) न सही

इशरत-ए-सोहबत-ए-खूबाँ (माशूक़ के साथ का ऐश्वर्य) ही गनीमत समझो
न हुई 'ग़ालिब', अगर उम्र-ए-तबीई (लम्बी उम्र) न सही     

जनवरी 08, 2013

क़हर



मैं उन्हें छेड़ूँ और,  कुछ न कहें
चल निकलते जो मय पिए होते,

क़हर हो या बला हो, जो कुछ हो 
काश ! कि तुम मेरे लिए होते,

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था 
दिल भी या रब ! कई दिए होते,

आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'
कोई दिन और भी जिए होते,

दिसंबर 13, 2012

बदनाम



न तीर कमाँ में है न सैय्याद (शिकारी) कमी (घात) में 
गोशे (कोने) में क़फ़स (पिंजरे) के मुझे आराम बहुत है,

क्या ज़ोहद (सब्र) को मानूँ कि न हो गरचे रियाई (ढोंगी)
पादाश-ए-अमल (नतीजा ) कि तमअ-ए-खाम (लालच) बहुत है,

है अहल-ए-खिरद (ज़हीन) किस रविश-ए-खास (खास तर्ज) पे नाज़ाँ (फख्र) 
पाबस्त्गी-ए-रस्म-ओ-रह-ए-आम (आम रीति रिवाज़ के बंधन) बहुत है,

ज़मज़म (पाक पानी) ही पे छोड़ो मुझे क्या तौफ-ए-हरम (काबे कि परिक्रमा) से
आलूद: ब मय (शराब में भीगा) जाम-ए-एहराम (हज का कपड़ा) बहुत है,

है क़हर गर अब भी न बने बात कि उनको 
इन्कार नहीं और मुझे इब्राम (इल्तिजा) बहुत है,

खूँ होके जिगर आँख से टपका नहीं ए ! मर्ग (मौत)
रहने दे मुझे यहाँ कि अभी काम बहुत है, 

होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने 
शायर तो वो अच्छा है पर बदनाम बहुत है, 
            

नवंबर 02, 2012

दुश्मन आसमां अपना


ज़िक्र उस परीवश (परिचेहरा) का और फिर बयाँ अपना
बन गया रक़ीब (दुश्मन) आखिर था जो राजदां अपना, 

मय (शराब) वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-गैर में, या रब !
आज ही हुआ मंज़ूर उनको इम्तिहाँ अपना, 

मंज़र (नज़ारा) एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श (आसमां) से इधर होता काश के मकाँ अपना, 

दे वो जिस क़दर ज़िल्लत (बेईज्ज़ती) हम हँसी में टालेंगे
बारे आशना (दोस्त) निकला उनका पासबां (पहरेदार) अपना, 

दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखला दूँ
उँगलियाँ फिगार (घायल) अपनी, खामा खूँ चका (खून से सना क़लम) अपना,

घिसते घिसते मिट जाता आपने अबस (बेकार) बदला
नंग-ए-सिजदा (सजदे के दाग) से संग-ए-आस्तां (चौखट) अपना,

ताकि करे न गम्माज़ी (चुगली), कर लिया है दुश्मन को 
दोस्त की शिकायत में हमने हमज़बाँ (राज़दार) अपना,

हम कहाँ के दाना (आलिम) थे किस हुनर में यकता (माहिर) थे ?
बेसबब (बिना वजह) हुआ है 'ग़ालिब' दुश्मन आसमां अपना,