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मई 20, 2011

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात



है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और 
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और 

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात 
दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और 

आबरू से है क्या उस निगाह -ए-नाज़ को पैबंद 
है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमाँ (कमान)और 

तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे 
ले आयेंगे बाज़ार से जाकर दिल-ओ-जाँ (जान) और 

हरचंद सुबुकदस्त (डूबे हुए) हुए बुतशिकनी (पत्थर की पूजा) में 
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ ( पत्थर की चट्टान) और 

है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता 
होते कई जो दीदा-ए-ख़ूँनाबफ़िशाँ (खून बहाने वाली आँखें) और 

मरता हूँ इस आवाज़ पे हरचंद सर उड़ जाये 
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाये कि हाँ और 

लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब (जन्नत) का धोखा 
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ (छुपा हुआ दाग) और 

देता न अगर दिल तुम्हें लेता कोई दम चैन 
करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और 

पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले 
रुकती है मेरी तब'अ (साँस) तो होती है रवाँ और 

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और 

मार्च 26, 2011

जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से


कभी नेकी भी उसके जी में आ जाये है मुझ से 
जफ़ायें करके अपनी याद शर्मा जाये है मुझ से, 

ख़ुदाया! ज़ज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है 
कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाये है मुझ से,

वो बद-ख़ू (बदमिजाज़), और मेरी दास्तान-ए-इश्क़ तूलानी (इश्क की लम्बी कहानी) 
इबारत मुख़्तसर, क़ासिद  भी घबरा जाये है मुझ से, 

उधर वो बदगुमानी है, इधर ये नातवानी (कमजोरी) है 
ना पूछा जाये है उससे, न बोला जाये है मुझ से,

सँभलने दे मुझे ऐ नाउम्मीदी, क्या क़यामत है 
कि दामन-ए-ख़याल-ए-यार छूटा जाये है मुझ से,

तकल्लुफ़ बर-तरफ़ (एक तरफ), नज़्ज़ारगी (रूहानियत) में भी सही, लेकिन 
वो देखा जाये, कब ये ज़ुल्म देखा जाये है मुझ से, 

हुए हैं पाँव ही पहले नवर्द-ए-इश्क़ (इश्क की जंग) में ज़ख़्मी 
न भागा जाये है मुझसे, न ठहरा जाये है मुझ से, 

क़यामत है कि होवे मुद्दई (दुश्मन) का हमसफ़र "ग़ालिब"
वो काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से


फ़रवरी 14, 2011

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना


बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना

गिरियां (रोना) चाहे है ख़राबी मेरे काशाने (घर) की
दर-ओ-दीवार से टपके है बयाबां (रेगिस्तान) होना

हाय  दीवानगी-ए-शौक़ कि हरदम मुझको
आप जाना उधर और आप ही हैरां होना

जल्वा अज़-बसकि(इस हद तक) तक़ाज़ा-ए-निगह (दावा) करता है
जौहर-ए-आईना (आईने का दाग) भी चाहे है मिज़गां (भीगी पलकें) होना

इशरते-क़त्लगहे-अहले-तमन्ना (सीने पर सर रखने की तमन्ना) मत पूछ
ईद-ए-नज़्ज़ारा( ईद का नज़ारा) है शमशीर (तलवार) का उरियां (नंगा) होना

ले गये ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-निशात (ख़ुशी की हसरत का दाग)
तू हो और आप बसद-रंग (सारे रंग) गुलिस्तां होना

इशरत-ए-पारा-ए-दिल (दिल के टुकड़े) ज़ख़्म-ए-तमन्ना ख़ाना
लज़्ज़त-ए-रेश-ए-जिग़र (जिगर के घाव) ग़र्क़-ए-नमकदां (नमक में डूबे)होना

की मेरे क़त्ल के बाद उसने जफ़ा से तौबा
हाय उस ज़ूद-पशेमां (गुनाहगार) का पशेमां (शर्मिंदा) होना

हैफ़ (शोक) उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिसकी क़िस्मत में हो आशिक़ का गिरेबां होना




जनवरी 12, 2011

दर्द बे-दवा पाया


कहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहाँ कि गुम कीजे? हमने मुद्दआ़ (वजह) पाया,

इश्क़ से तबीअ़त ने ज़ीस्त (जिंदगी) का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द बे-दवा पाया,

दोस्त दारे-दुश्मन (दुश्मन का दोस्त) है, एतमादे-दिल (यकीन) मालूम
आह बेअसर देखी, नाला (रोना) नारसा (बेकार) पाया,

सादगी व पुरकारी (चालाकी) बेख़ुदी व हुशियारी
हुस्न को तग़ाफ़ुल (बेपरवाही) में जुरअत-आज़मा पाया,

गुंचा फिर लगा खिलने, आज हम ने अपना दिल 
खूँ  किया हुआ देखा, गुम किया हुआ पाया,

हाल-ए-दिल नहीं मालूम, लेकिन इस क़दर यानी
हम ने बारहा (बार-बार) ढूंढा, तुम ने बारहा पाया,

शोर-ए-पन्दे-नासेह (उपदेश का शोर) ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का
आप से कोई पूछे, तुम ने क्या मज़ा पाया,

ना असद जफ़ा-साइल (ज़ालिम) ना सितम जुनूं-माइल (दीवाना)
तुझ को जिस क़दर ढूंढा उल्फ़त-आज़मा (पारखी) पाया,

सितंबर 15, 2010

दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ

दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ,

जमा करते हो क्यूँ रकीबो को
इक तमाशा हुआ, गिला न हुआ,

हम कहाँ किस्मत आजमाने जाएँ
तू ही जब खंजर-आज़मा न हुआ,

कितने मीठे हैं तेरे लब, की रकीब 
गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ,

है खबर आज उनके आने की
आज ही घर में बोरिया* न हुआ,

क्या वो नमरुद** की खुदाई थी,
बन्दगी में मेरा भला न हुआ,

जान दी, दी हुई उसी की थी
हक तो ये है, की हक अदा न हुआ,

ज़ख्म गर दब गया, लहू न थमा
काम गर रुक गया, रवा न हुआ,

कुछ तो पढ़िए की लोग कहते है
आज ग़ालिब, गज़लसरा न हुआ,
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* बोरिया - बिस्तर 
** नमरुद - एक बादशाह, जो अपने आप को खुदा कहता था