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जनवरी 05, 2012

जहाँ कोई न हो


रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो 
हमसुख़न (हमदर्द) कोई न हो और हमज़बाँ (अपनी भाषा जानने वाला) कोई न हो, 

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये 
कोई हमसाया (साथी) न हो और पासबाँ (हिफाज़त करने वाला) कोई न हो, 

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार (बीमार की सेवा करने वाला) 
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ (मौत पर रोने वाला) कोई न हो,



दिसंबर 19, 2011

ग़ालिब का पता मिलता है,

 प्रिय ब्लॉगर साथियों,

आज पेश है मिर्ज़ा असद उल्लाह ख़ां उर्फ “मिर्ज़ा ग़ालिब” कि शान में लिखी आज के दौर के बेहतरीन शायर 'गुलज़ार' साहब कि एक नज़्म.....उम्मीद है आप सबको पसंद आएगी|
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सुबह का झटपटा, चारों तरफ़ अँधेरा, 
लेकिन उफ़ुक़ पर थोड़ी- सी लाली। 
यह क़िस्सा दिल्ली का, सन १८६७ ईसवी, 
दिल्ली की तारीख़ी इमारतें

सर्दियों की धुंध - कोहरा, पुराने खण्डरात,
ख़ानदान - तैमूरिया की निशानी लाल क़िला 
हुमायूँ का मकबरा - जामा मस्जिद,

एक नीम तारीक कूँचा, गली क़ासिम जान 
एक मेहराब का टूटा-सा कोना -
दरवाज़ों पर लटके टाट के बोसीदा परदे
डेवढ़ी पर बँधी एक बकरी के मिमियाने की आवाज़, 

धुंधलके से झाँकते एक मस्जिद के नकूश 
पान वाले की बंद दुकान के पास 
दीवारों पर पान की पीक के छींटे
यही वह गली थी जहाँ ग़ालिब की रिहाइश थी, 

उन्हीं तस्वीरों पर एक आवाज़ उभरती है
बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा,

और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटड़े की बड़ी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले,

इसी बेनूर अँधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरआने सुख़न का सफ़्हा खुलता है 
असद उल्लाह ख़ाँ `ग़ालिब' का पता मिलता है,
  
                               - गुलज़ार 

दिसंबर 07, 2011

अंदाज़-ए-बयाँ


है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और 
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और, 

या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात 
दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और, 

आबरू से है क्या उस निगाह -ए-नाज़ को पैबंद 
है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमाँ और, 

तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे 
ले आयेंगे बाज़ार से जाकर दिल-ओ-जाँ और, 

हरचंद सुबुकदस्त (हाथ लगे रहे ) हुए बुतशिकनी (पत्थर की पूजा) में 
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ (चट्टान का पत्थर) और, 

है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता 
होते कई जो दीदा-ए-ख़ूँनाबफ़िशाँ (खून रोने वाली आँखे) और, 

मरता हूँ इस आवाज़ पे हरचंद सर उड़ जाये 
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाये कि हाँ और, 

लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब (चमकता सूरज) का धोका 
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ (छुपा हुआ दाग) और, 

लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन 
करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ (कराह) और, 

पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले (रोना)
रुकती है मेरी तब'अ (तबियत) तो होती है रवाँ और, 

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर (शायर) बहुत अच्छे 
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और, 

नवंबर 14, 2011

इन्तज़ार


ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार (मिलन) होता 
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता, 

तेरे वादे पर जीये हम तो ये जान झूठ जाना 
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता, 

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अ़हद (सिर्फ) बोदा (वादा) 
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार (वफादार) होता, 

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश (नज़रों के तीर) को 
ये ख़लिश (चुभन) कहाँ से होती जो जिगर के पार होता, 

ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह (उपदेशक) 
कोई चारासाज़ (हकीम) होता, कोई ग़मगुसार (हमदर्द) होता, 

रग-ए-संग (पत्थर की नसों) से टपकता वो लहू कि फिर न थमता 
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार (अंगारा) होता, 

ग़म अगर्चे जां-गुसिल (जानलेवा) है, पर कहां बचे कि दिल है 
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता,

कहूँ किससे मैं कि क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है 
मुझे क्या बुरा था मरना? अगर एक बार होता, 

हुए मर के हम जो रुस्वा, हुए क्यों न ग़र्क़-ए-दरिया (दरिया में डूबना)
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता 

उसे कौन देख सकता, कि यग़ाना (बेमिसाल) है वो यकता (अद्वितीय) 
जो दुई (दुविधा) की बू भी होती तो कहीं दो चार होता 

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ (सूफियों की तरह सोचना), ये तेरा बयान "ग़ालिब"! 
तुझे हम वली (पीर) समझते, जो न बादाख़्वार (शराबी) होता

अक्टूबर 14, 2011

हसरत


इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही 
मेरी वहशत, तेरी शोहरत ही सही 

क़तअ़ (खत्म) कीजे न तअ़ल्लुक़ हम से 
कुछ नहीं है, तो अ़दावत ही सही 

मेरे होने में है क्या रुस्वाई?
वो मजलिस नहीं ख़िल्वत (एकांत) ही सही 

हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपने
ग़ैर को तुझ से मुहब्बत ही सही 

अपनी हस्ती ही से हो, जो कुछ हो 
आगही (होश) गर नहीं ग़फ़लत ही सही 

उम्र हरचंद कि है बर्क़-ख़िराम (दौड़ती हुई)  
दिल के ख़ूँ करने की फ़ुर्सत ही सही 

हम कोई तर्क़-ए-वफ़ा करते हैं 
न सही इश्क़ मुसीबत ही सही 

कुछ तो दे, ऐ फ़लक-ए-नाइन्साफ़ 
आह-ओ-फ़रिय़ाद की रुख़सत ही सही 

हम भी तस्लीम की खूँ डालेंगे 
बेनियाज़ी (ठुकराना) तेरी आदत ही सही 

यार से छेड़ चली जाये, "असद" 
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही