मिर्ज़ा - असद उल्लाह ख़ां उर्फ ग़ालिब जिन्हें "मिर्ज़ा ग़ालिब" के नाम से भी जाना जाता है|उर्दू अदब के महान शायर थे वैसे तो उनके बारे में कुछ कहना या कुछ लिखना सूरज को दीया दिखाने के बराबर है| इस ब्लॉग के ज़रिये मेरी कोशिश है कि उनकी गजलों को सरल तरीके से पेश कर सकूं और इसके पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके कलाम को पढ़ और समझ सके |
जून 21, 2013
मई 25, 2013
परअफशाँ
अजब नशात (ख़ुशी) से जल्लाद के चले हैं हम आगे
कि अपने साये से सर पाँव से है दो कदम आगे,
कज़ा (मौत) ने था मुझे चाहा ख़राब-ए-बाद-ए-उल्फत (इश्क़ का नशा)
फ़क़त 'ख़राब' लिखा बस न चल सका क़लम इससे आगे,
गम-ए-ज़माने ने झाड़ी नशात-ए-इश्क़ की मस्ती
वर्ना हम भी उठाते थे लज्ज़त-ए-अलम (दुःख की ख़ुशी) आगे,
ख़ुदा के वास्ते दाद इस जूनून-ए-शौक की देना
कि उसके दर पे पहुँचते हैं हम नामाबर (डाकिये) से आगे,
ये उम्र भर जो परेशानियाँ उठाई हैं हमने
तुम्हारे आइयो-ए-तुर्रह-ए-ख़म ब: ख़म (घुँघराले बालों की लटें) आगे,
दिल-ओ-जिगर में परअफशाँ (बेचैन) जो एक मौज-ए-खूँ (खून की लहर) है
हम अपने ज़ोम (गुरुर) में समझे हुए थे उसको दम (साँसे) आगे,
क़सम जनाज़े पे आने की मेरे खाते हैं 'ग़ालिब'
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की क़सम आगे,
अप्रैल 16, 2013
आतिश-ए-दोज़ख
कोई (कुछ) दिन गर ज़िन्दगानी और है
अपने जी (दिल) में हमने ठानी और है,
आतिश-ए-दोज़ख (दोज़ख की आग) में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-गम-ए-निहानी (अंदरूनी गम की जलन) और है,
बारहा (कई बार) देखी हैं उनकी रंजिशें (दुश्मनी)
पर कुछ अब के सरगिरानी (नाराज़गी) और है,
दे के ख़त मुँह देखता है नामाबर (डाकिया)
कुछ तो पैगाम-ए-ज़बानी (मौखिक) और है,
काते-ए-अमार (उम्र काटते) हैं अक्सर नुज़ूम (तारे)
वो बला-ए-आसमानी (आसमानी तबाही) और है,
हो चुकीं हैं 'ग़ालिब' बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी (अचानक मौत) और है,
मार्च 05, 2013
परदा
लागर (दुबला) इतना हूँ कि गर तू बज़्म में जा (जगह) दे मुझे
मेरा ज़िम्मा, देखकर गर कोई बतला दे मुझे,
क्या तअज्जुब है कि उसको देखकर आ जाए रहम
वाँ (वहाँ) तलक कोई किसी हीले (बहाने) से पहुँचा दे मुझे,
मुँह न दिखलाएं, न सही ब अंदाज़-ए-इताब (गुस्से में)
खोलकर परदा ज़रा आँखें ही दिखला दें मुझे,
याँ (यहाँ) तलक मेरी गिरफ़्तारी से वो ख़ुश है, कि मैं
ज़ुल्फ़ गर बन जाऊँ तो शाने (कंधे) में उलझा दें मुझे,
- मिर्ज़ा ग़ालिब
फ़रवरी 18, 2013
क़यामत
नहीं कि मुझको क़यामत का एतिकाद (यकीन) नहीं
शब-ए-फिराक (विरह कि रात) से रोज़-ए-जज़ा (क़यामत) ज्यादा नहीं,
कोई कहे कि शब-ए-मह (चाँदनी रात) में क्या बुराई है
बला से आज अगर दिन को अब्र-ओ-बाद (सुहानी घटा) नहीं,
जो आऊँ सामने उनके तो मरहबा (स्वागत) न कहें
जो जाऊँ वहाँ से कहीं को तो खैरबाद (विदाई) नहीं,
कभी जो याद भी आता हूँ मैं, तो कहते हैं कि
आज बज़्म में कुछ फ़ित्न-ओ-फिसाद (लड़ाई-झगड़ा) नहीं,
आलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब
गदा-ए-कूचा-ए-मयखाना नामुराद (मयखाने का भिखारी) नहीं,
जहाँ में हैं गम-ओ-शाद बहम (साथ) हमे क्या काम
दिया है हमको खुदा ने वो दिल कि शाद (खुश) नहीं,
तुम उनके वादे का ज़िक्र उनसे क्यूँ करों 'ग़ालिब'
ये क्या कि तुम कहो, और वो कहें कि याद नहीं,
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