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February 21, 2012

पत्थर नहीं हूँ मैं


दायम (हमेशा) पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं,

क्यों गर्दिश-ए-मुदाम (बुरा वक़्त) से घबरा न जाये दिल ?
इन्सान हूँ, प्याला-ओ-साग़र (शराब का प्याला) नहीं हूँ मैं,

या रब! ज़माना मुझको मिटाता है किस लिये ?
लौह-ए-जहां (लोहे के वरक़) पे हर्फ़-ए-मुक़र्रर (हमेशा का लिखा) नहीं हूँ मैं,

हद चाहिये सज़ा में उक़ूबत (दर्द) के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ, काफ़िर नहीं हूँ मैं,

किस वास्ते अज़ीज़ (अपने) नहीं जानते मुझे ?
लाल-ओ-ज़मुर्रुदो--ज़र-ओ-गौहर (लाल,पन्ना,सोना और मोती) नहीं हूँ मैं,

रखते हो तुम क़दम मेरी आँखों से क्यों दरेग़ (दूर) ?
रुतबे में मेहर-ओ-माह सूरज और चाँद) से कमतर नहीं हूँ मैं,

करते हो मुझको मनअ़-ए-क़दम-बोस (पैर चूमने से मना) किस लिये ?
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मैं ?

'ग़ालिब' वज़ीफ़ाख़्वार (पेंशन पाने वाले) हो, दो शाह (बादशाह) को दुआ
वो दिन गये कि कहते थे "नौकर नहीं हूँ मैं" ,

11 टिप्पणियाँ:

  1. ग़ालिब को पढ़ना... वाह! अलग ही अनुभव है हमेशा..
    सादर आभार...

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  2. शुक्रिया संजय जी, सुषमा जी और सदा जी ।

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  3. ग़ालिब एक ही साँस में खुद को क्या क्या बना डालते हैं...कभी आकाश, कभी सूरज-चान्द और कभी खुद को बादशाह का नौकर...बेबसी भी ऐसी कि पत्त्थर तक बनने को तैयार हैं..तभी न कहते हैं ग़ालिब का है अंदाजे बयान और...

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  4. बिलकुल अनीता जी तभी तो ग़ालिब को सदियों का शायर कहते हैं ।

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  5. ग़ालिब जी को पढ़ना लगा,बेहतरीन सराहनीय प्रस्तुति,

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...

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  6. Galib ko padhna adbhut lagta hai ...shukriya is post ke liye Imran jee ... !!

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...