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फ़रवरी 04, 2012

क़रार


आ, कि मेरी जान को क़रार नहीं है 
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तज़ार (इंतज़ार के बर्दाश्त की ताक़त) नहीं है, 

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर (दुनिया की जिंदगी) के बदले 
नशा बअन्दाज़ा-ए-ख़ुमार (खुमार का अंदाज़) नहीं है,

गिरियां (गिरते आंसू) निकाले है तेरी बज़्म से मुझको 
हाय कि रोने पे इख़्तियार नहीं है, 

हमसे अ़बस (बेरुखी) है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर (नाराज़गी का अंदेशा) 
ख़ाक में उश्शाक़ (आशिक) की ग़ुबार नहीं है,

दिल से उठा लुत्फ-ए-जल्वा हाए म'आनी (मतलब) 
ग़ैर-ए-गुल (बिना फूल के) आईना-ए-बहार नहीं है,

क़त्ल का मेरे किया है अ़हद (फैसला) तो बारे (आखिर) 
वाये! अखर (लेकिन) अ़हद उस्तवार (पक्का) नहीं है, 

तूने क़सम मैकशी (शराबखोरी) की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का मगर कुछ ऐतबार नहीं है,

9 टिप्‍पणियां:

  1. (1)Hosh Tab Aaya Jab Usne Kaha Ki Khuda Kisi ek Ka Nahi Hota.... :)

    (2)Teri jeet ho chuki hay.... :)

    (3)Subah se shaam tak bojh dhota hua ,
    Apni hi laash ka khud mazaar aadmi.... !!

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  2. जब खो जाता है दिल का करार
    होता नहीं और इंतजार, रोने पे भी रहता नहीं इख्तियार...तभी वह आता है, बहुत उम्दा गजल, शुक्रिया !

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  3. इमरान सा'ब, मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों को देवनागरी में शब्दार्थ सहित पेश करने का बहुत शुक्रिया!!

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  4. सार्थक प्रयास के लिए बहुत आभार ...

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  5. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...