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नवंबर 13, 2013

खुदा की कुदरत



ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं 
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं,

वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है 
कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं,

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को 
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख्म-ए-जिगर को देखते हैं,

तेरे जवाहिर-ए-तर्फ़-ए-कुल (ताज में जड़े हीरे) को क्या देखें !
हम औज-ए-ताले-ए-लाल-ओ-गुहर (हीरे की किस्मत) को देखते हैं,      

5 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा कार्य
    बेहतरीन गजल को इक जगह जमा करना
    खुद नेमत दे आपको भाई

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  2. http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/के शुक्रवारीय अंक ४४ १५/११/२०१३ में आपकी पोस्ट को शामिल किया गया कृपया अवलोकन हेतु पधारे धन्यवाद

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  3. ग़ालिब की बहुत प्रसिद्ध गजल..पढवाने के लिए शुक्रिया..

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  4. एक उम्दा गज़ल को पढवाने का शुक्रिया ...

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को और सभी ब्लॉगर-मित्रों को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...