Click here for Myspace Layouts

सितंबर 28, 2013

वक़्त



मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त  
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ,

ज़ोफ़ (कमज़ोरी) में ताना-ए-अगयार (दुश्मन के ताने) का शिकवा क्या है 
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ,

ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना 
क्या कसम है तेरे मिलने की, कि खा भी न सकूँ,   



6 टिप्‍पणियां:

  1. "मिर्ज़ा ग़ालिब" जी के शेर साझा करने के लिए आभार !!! इमरान जी ...

    नई रचना : सुधि नहि आवत.( विरह गीत )

    उत्तर देंहटाएं
  2. मिर्ज़ा की ग़ज़लों से रु-ब-रु कराती आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल रविवार, दिनांक 29 सितम्बर 2013, को ब्लॉग प्रसारण पर भी लिंक की गई है , कृपया पधारें , औरों को भी पढ़ें और सराहें,
    साभार सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह, उम्दा पंक्तियाँ। वैसे एक ख्याल (आउट ऑफ़ लिंक) आया कि 'वो' तो वाकई न गया वक़्त है, न आनेवाला .. 'वो' तो समय से परे है, आकारों-विचारों से परे ..

    सादर,
    मधुरेश

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बेहतरीन ग़ज़ल ... चित्रा जी की आवाज़ में बहुत शानदार धुन में पिरोई गयी है

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...