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सितंबर 25, 2012

क़त्ल



दोस्त ग़मख्वारी (दुःख) में मेरी सई (मदद) फरमाएंगे क्या?
ज़ख्म के भरने तलक नाख़ून न बढ़ जायेंगे क्या?

बेनियाज़ी (तकलीफ) हद से गुज़री बंदापरवर, कब तलक? 
हम कहेंगे हाल-ए-दिल, और आप फरमाएंगे 'क्या'?

हज़रत -ए-नासेह (उपदेशक) गर आयें दीद-ओ-दिल फर्श-ए-राह (क़दमों में पलकें) 
कोई मुझको यह तो समझा दो, कि समझायेंगे क्या?

आज वाँ तेग-ओ-कफ़न (तलवार और कफ़न) बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज्र (ऐतराज़) मेरे क़त्ल में, वो अब लायेंगे क्या?

गर किया नासेह ने हमको क़ैद, अच्छा यूँ ही सही 
ये जूनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छूट जाएगें क्या?

खाना जाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं (जुल्फों के बंदी), ज़ंजीर से भागेंगे क्यूँ 
है गिरफ्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां (कैदखाने) से घबराएंगे क्या?

है अब इस मामूरे (बस्ती) में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फत (इश्क़ का आकाल)
हमने यह माना, कि दिल्ली में रहेंगे, खायेंगे क्या?  

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. बेनामीसितंबर 25, 2012

      शुक्रिया सुधा जी।

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  2. हिंदी अर्थ देने का यह तरीका ज्यादा अच्छा लगा ग़ालिब साहब तक पहुँचने को आसान बना दिया

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    1. बेनामीसितंबर 25, 2012

      शुक्रिया वंदना जी। इसलिए ही यहाँ देता हूँ की पढ़ते समय ही बात समझ में आ जाये क्योंकि पहले पढो फिर नीचे देखो तब तक बात स्लिप हो जाती है।

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  3. इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए आभार

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    1. बेनामीसितंबर 25, 2012

      शुक्रिया सदा जी।

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति इमरान भाई!

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    1. बेनामीसितंबर 25, 2012

      शुक्रिया मधुरेश जी।

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  5. बहुत उम्दा प्रस्तुति,,,मिर्जा साहब की गजल पढवाने के लिये ,शुक्रिया,,,

    RECENT POST : गीत,

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    उत्तर
    1. बेनामीसितंबर 27, 2012

      बहुत शुक्रिया धीरेन्द्र जी।


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