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सितंबर 07, 2012

निकम्मा



गैर लें महफ़िल में बोसे (चुम्बन) जाम के 
हम रहे यूँ तिशना लब (प्यासे) पैगाम के,

खस्तगी (बर्बादी) का तुमसे क्या शिकवा कि ये
हथकंडे हैं चर्खे-ए-नीली फाम (नीले आसमान) के,

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के

रात पी ज़मज़म (पाक पानी) और मय सुबहदम (सुबह)
धोये धब्बे जाम-ए-अहराम (हज के पाक कपड़े) के,

दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हलके (धागे) हैं तुम्हारे दाम (जाल) के,

शाह (बादशाह) के है गुस्ल-ए-सेहत की खबर
देखिये दिन कब फिरें हम्माम (गुस्लखाना) के,

इश्क ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया 
वरना हम भी आदमी थे काम के, 

14 टिप्‍पणियां:

  1. अभी तक तो इतना ही शेर जानते थे और दोहराते थे ..
    इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
    वरना हम भी आदमी थे कामके
    ....आज पहली बार मुकम्मल ग़ज़ल जानी ...आभार इमरान जी

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    1. बेनामीसितंबर 07, 2012

      बहुत बहुत शुक्रिया सरस जी ।

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  2. यदि आज के लिहाज़ से देखें तो यह शे'र बहुत ही उम्दा है-
    शाह के है गुस्ल-ए-सेहत की खबर
    देखिये दिन कब फिरें हम्माम के
    बहुत खूब है ग़ालिब आज भी.

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    1. बेनामीसितंबर 07, 2012

      शुक्रिया भूषण जी.....सही कहा आपने यूँ ही ग़ालिब को सदी का शायर नहीं कहा गया ।

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  3. उत्तर
    1. बेनामीसितंबर 10, 2012

      बहुत बहुत शुक्रिया अवन्ती जी।

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  4. आपकी इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए आभार

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    1. बेनामीसितंबर 10, 2012

      शुक्रिया सदा जी।

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  5. ग़ालिब साहब की बहुत ही उम्दा बेहतरीन प्रस्तुति,,,,आभार इमरान जी,,,

    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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    1. बेनामीसितंबर 10, 2012

      शुक्रिया धीरेन्द्र जी।

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  6. इसके तो बस अंतिम शे’र से वाकिफ़ थे। आज आपने पूरी ग़ज़ल पढ़वा दी। शुक्रिया।

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    1. बेनामीसितंबर 10, 2012

      बहुत बहुत शुक्रिया मनोज जी।

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  7. खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
    हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के

    बहुत खूब...ग़ालिब दा जवाब नहीं..

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    1. बेनामीसितंबर 10, 2012

      बहुत बहुत शुक्रिया अनीता जी।

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