Click here for Myspace Layouts

सितंबर 07, 2012

निकम्मा



गैर लें महफ़िल में बोसे (चुम्बन) जाम के 
हम रहे यूँ तिशना लब (प्यासे) पैगाम के,

खस्तगी (बर्बादी) का तुमसे क्या शिकवा कि ये
हथकंडे हैं चर्खे-ए-नीली फाम (नीले आसमान) के,

ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के

रात पी ज़मज़म (पाक पानी) और मय सुबहदम (सुबह)
धोये धब्बे जाम-ए-अहराम (हज के पाक कपड़े) के,

दिल को आँखों ने फँसाया क्या मगर
ये भी हलके (धागे) हैं तुम्हारे दाम (जाल) के,

शाह (बादशाह) के है गुस्ल-ए-सेहत की खबर
देखिये दिन कब फिरें हम्माम (गुस्लखाना) के,

इश्क ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया 
वरना हम भी आदमी थे काम के, 

14 टिप्‍पणियां:

  1. अभी तक तो इतना ही शेर जानते थे और दोहराते थे ..
    इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
    वरना हम भी आदमी थे कामके
    ....आज पहली बार मुकम्मल ग़ज़ल जानी ...आभार इमरान जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. यदि आज के लिहाज़ से देखें तो यह शे'र बहुत ही उम्दा है-
    शाह के है गुस्ल-ए-सेहत की खबर
    देखिये दिन कब फिरें हम्माम के
    बहुत खूब है ग़ालिब आज भी.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया भूषण जी.....सही कहा आपने यूँ ही ग़ालिब को सदी का शायर नहीं कहा गया ।

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया अवन्ती जी।

      हटाएं
  4. आपकी इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. ग़ालिब साहब की बहुत ही उम्दा बेहतरीन प्रस्तुति,,,,आभार इमरान जी,,,

    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

    उत्तर देंहटाएं
  6. इसके तो बस अंतिम शे’र से वाकिफ़ थे। आज आपने पूरी ग़ज़ल पढ़वा दी। शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  7. खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
    हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के

    बहुत खूब...ग़ालिब दा जवाब नहीं..

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...