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जनवरी 12, 2011

दर्द बे-दवा पाया


कहते हो, न देंगे हम, दिल अगर पड़ा पाया
दिल कहाँ कि गुम कीजे? हमने मुद्दआ़ (वजह) पाया,

इश्क़ से तबीअ़त ने ज़ीस्त (जिंदगी) का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द बे-दवा पाया,

दोस्त दारे-दुश्मन (दुश्मन का दोस्त) है, एतमादे-दिल (यकीन) मालूम
आह बेअसर देखी, नाला (रोना) नारसा (बेकार) पाया,

सादगी व पुरकारी (चालाकी) बेख़ुदी व हुशियारी
हुस्न को तग़ाफ़ुल (बेपरवाही) में जुरअत-आज़मा पाया,

गुंचा फिर लगा खिलने, आज हम ने अपना दिल 
खूँ  किया हुआ देखा, गुम किया हुआ पाया,

हाल-ए-दिल नहीं मालूम, लेकिन इस क़दर यानी
हम ने बारहा (बार-बार) ढूंढा, तुम ने बारहा पाया,

शोर-ए-पन्दे-नासेह (उपदेश का शोर) ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का
आप से कोई पूछे, तुम ने क्या मज़ा पाया,

ना असद जफ़ा-साइल (ज़ालिम) ना सितम जुनूं-माइल (दीवाना)
तुझ को जिस क़दर ढूंढा उल्फ़त-आज़मा (पारखी) पाया,

7 टिप्‍पणियां:

  1. सागर से एक और मोती लाने का शुक्रिया..........ग़ालिब को कितना भी पढो हर बार कुछ नया एहसास होता है..

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  2. इमरान जी !! मिर्जा ग़ालिब जी की इस सुन्दर गजल को शेयर किया आपने .. सादर शुक्रिया .. कल चर्चामंच पर आपका ब्लॉग और यह गजल होगी..

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  3. बडी सुन्दर गज़ल लगाई है।

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  4. आज ४ फरवरी को आपका यह सुन्दर ब्लॉग और पोस्ट चर्चामंच पर है... आपका धन्यवाद ..कृपया वह आ कर अपने विचारों से अवगत कराएं

    http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...