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सितंबर 15, 2010

दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ

दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ,

जमा करते हो क्यूँ रकीबो को
इक तमाशा हुआ, गिला न हुआ,

हम कहाँ किस्मत आजमाने जाएँ
तू ही जब खंजर-आज़मा न हुआ,

कितने मीठे हैं तेरे लब, की रकीब 
गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ,

है खबर आज उनके आने की
आज ही घर में बोरिया* न हुआ,

क्या वो नमरुद** की खुदाई थी,
बन्दगी में मेरा भला न हुआ,

जान दी, दी हुई उसी की थी
हक तो ये है, की हक अदा न हुआ,

ज़ख्म गर दब गया, लहू न थमा
काम गर रुक गया, रवा न हुआ,

कुछ तो पढ़िए की लोग कहते है
आज ग़ालिब, गज़लसरा न हुआ,
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* बोरिया - बिस्तर 
** नमरुद - एक बादशाह, जो अपने आप को खुदा कहता था  

4 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन कविता है आपकी
    कभी समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी आये
    http://www.meriawajmerikavitaye.blogspot.com/

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  2. Ghalib the great...........everyone's favourite
    nice collection.

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...