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जून 21, 2013

यूँ होता तो क्या होता

न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता, 

हुआ जब गम से यूँ बेहिस, तो गम क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से, तो जानू (घुटने) पर धरा होता,

हुई मुद्दत के मर गया 'ग़ालिब' पर याद आता है 
वो हर एक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता,

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढि़या कलेक्शन
    फोटो, सूक्तिया, गलत और खलील जिब्रान का लेखन

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  2. वाकई अभी भी तो याद आते हैं गालिब
    अब भी तो हम पढते हैं गालिब ।

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...