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जनवरी 08, 2013

क़हर



मैं उन्हें छेड़ूँ और,  कुछ न कहें
चल निकलते जो मय पिए होते,

क़हर हो या बला हो, जो कुछ हो 
काश ! कि तुम मेरे लिए होते,

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था 
दिल भी या रब ! कई दिए होते,

आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'
कोई दिन और भी जिए होते,

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! बहुत सुंदर गजल ! यहाँ दिल भी नाकाफी है और वक्त भी..

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  2. जबाब नही ग़ालिब साहब का,,,,बहुत खूब लाजबाब गजल,,,आभार इमरान जी,,

    recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

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  3. bahoot khoob kitni ashani se apni baat kah dete hai...lajawab

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...