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नवंबर 02, 2012

दुश्मन आसमां अपना


ज़िक्र उस परीवश (परिचेहरा) का और फिर बयाँ अपना
बन गया रक़ीब (दुश्मन) आखिर था जो राजदां अपना, 

मय (शराब) वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-गैर में, या रब !
आज ही हुआ मंज़ूर उनको इम्तिहाँ अपना, 

मंज़र (नज़ारा) एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श (आसमां) से इधर होता काश के मकाँ अपना, 

दे वो जिस क़दर ज़िल्लत (बेईज्ज़ती) हम हँसी में टालेंगे
बारे आशना (दोस्त) निकला उनका पासबां (पहरेदार) अपना, 

दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखला दूँ
उँगलियाँ फिगार (घायल) अपनी, खामा खूँ चका (खून से सना क़लम) अपना,

घिसते घिसते मिट जाता आपने अबस (बेकार) बदला
नंग-ए-सिजदा (सजदे के दाग) से संग-ए-आस्तां (चौखट) अपना,

ताकि करे न गम्माज़ी (चुगली), कर लिया है दुश्मन को 
दोस्त की शिकायत में हमने हमज़बाँ (राज़दार) अपना,

हम कहाँ के दाना (आलिम) थे किस हुनर में यकता (माहिर) थे ?
बेसबब (बिना वजह) हुआ है 'ग़ालिब' दुश्मन आसमां अपना,  
   

17 टिप्‍पणियां:

  1. हम कहाँ आलिम थे किस हुनर में माहिर थे....
    बेवजह हुआ है 'ग़ालिब' दुश्मन आसमां अपना....!!

    बहुत खूब गज़ल....
    शुक्रिया इमरान...!!

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  2. हम कहाँ के दाना (आलिम) थे किस हुनर में यकता (माहिर) थे ?
    बेसबब (बिना वजह) हुआ है 'ग़ालिब' दुश्मन आसमां अपना,

    वाह ... बहुत खूब

    आभार इस प्रस्‍तुति के लिये

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  3. बहुत खूब,,,,ग़ालिब जी की लाजबाब गजल,,,साझा करने के लिये आभार,,,,इमरान जी,,,

    RECENT POST : समय की पुकार है,

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  4. हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे ?
    बेसबब हुआ है 'ग़ालिब' दुश्मन आसमां अपना !
    ग़ालिब का तो जवाब ही नहीं .. और आपने इन क्लिष्ट शब्दों का अर्थ बताकर हमें आसानी से समझाया, इसके लिए फिर एक बार शुक्रिया ..
    सादर
    मधुरेश

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  5. बेहद सुंदर, मगर थोड़ी सी कठिन गजल..अंतिम शेर कमाल का है..

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  6. ग़ालिब को पढ़ना एक अलग ही अनुभव से गुज़रना होता है।

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  7. बेनामीमई 17, 2015

    किसी के पास गालिब के शेर/शायरी /गझल का हिंदी में अनुवाद /भाषांतर कीई हुई site का पता हो तो बतावो या फिर कोई ऐसी किताब हो तो बतावो और कहा मिलेगी
    my email bushu75@gmail.com
    शुक्रिया

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...