Click here for Myspace Layouts

जनवरी 05, 2012

जहाँ कोई न हो


रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो 
हमसुख़न (हमदर्द) कोई न हो और हमज़बाँ (अपनी भाषा जानने वाला) कोई न हो, 

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये 
कोई हमसाया (साथी) न हो और पासबाँ (हिफाज़त करने वाला) कोई न हो, 

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार (बीमार की सेवा करने वाला) 
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ (मौत पर रोने वाला) कोई न हो,



23 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...बहुत खूब ..बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर गजल !
    ऐसी जगह तो आजकल बड़े शहरों में बहुत मिल जाएँगी...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामीजनवरी 06, 2012

    मेल के द्वारा प्राप्त टिप्पणी -

    सोनरूपा विशाल ने आपकी पोस्ट " ग़ालिब का पता मिलता है, " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    ये नज्म मेरी बहुत पसंदीदा है ......नया ज्ञानोदय में पढ़ी थी आज फिर से पढकर अच्छा लगा !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेनामीजनवरी 08, 2012

    @ अनीता जी ये व्यंग्य है पर सच है.....शायद ग़ालिब के वक़्त में ऐसा नहीं था तब लोग एक दूसरे से जुड़े रहते थे और उनके दुःख सुख में शरीक भी होते थे |

    उत्तर देंहटाएं
  5. कल 11/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, उम्र भर इस सोच में थे हम ... !

    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  6. उन्दा प्रस्तुति |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  7. रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो
    हमसुखन कोई न हो और हमजबां कोई न हो

    अपना साहित्य(हमसुखन)और अपनी भाषा(हमज़बां) भी कहें तो गलत नहीं हैं। सुखन को अदब या साहित्य के अर्थ में भी लोग लेते हैं। सुखन को अब तक इसी अर्थ में मैं लेता रहा हूं।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बेनामीजनवरी 11, 2012

      शुक्रिया जाहिद साहब......हमसुखन का शायद ये ही मतलब हो.......दरअसल मैंने जिस किताब से इसे लिया था वहाँ यही मतलब था......खैर शुक्रिया आपकी आमद का और आपका सुझाव सर माथे पर |

      हटाएं
  8. gaalib ki najmon par tippadi karna sooraj ko diya dikhana hae |aabhar jo aapne unki sundar najm se parichit karvaya .

    उत्तर देंहटाएं
  9. waah! sahi kahte hai ke....galib ka hai andaajebyaan aur....pahli baar is blog par aana hua,khushi huee yhan aakar...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बेनामीजनवरी 11, 2012

      शुक्रिया ........स्वागत है आपका|

      हटाएं
  10. वाह बेहतरीन गज़ल...
    शायद ये उन्होंने आखरी वक्त में लिखी हो???

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बेनामीजनवरी 11, 2012

      हो सकता है विद्या जी .........इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है |

      हटाएं
    2. हा ऐसी कल्पना कोई अपने आखरी वक्त मे हि करेगा जवानी मे ऐसा लिखने की हिम्मत कहां है
      जब गालिब अपनी मुफ़लिसी मे जीवन यापन कर रहे थे तब उन्होने ये गजल लिखी

      हटाएं
  11. सादर आभार इमरान भाई, बेशकीमती अशआर शेयर करने के लिए...

    उत्तर देंहटाएं
  12. ग़ालिब साहब के
    उम्दा कलाम के ज़रिये
    सब से रु-ब-रु होने के लिए
    शुक्रिया ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. आज के दोर मे ऐसी गजलो की कल्पना भी नहीं होती वाह क्या गजल है

    उत्तर देंहटाएं
  14. वाह क्या गजल है शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं

जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...