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मार्च 26, 2011

जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से


कभी नेकी भी उसके जी में आ जाये है मुझ से 
जफ़ायें करके अपनी याद शर्मा जाये है मुझ से, 

ख़ुदाया! ज़ज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है 
कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाये है मुझ से,

वो बद-ख़ू (बदमिजाज़), और मेरी दास्तान-ए-इश्क़ तूलानी (इश्क की लम्बी कहानी) 
इबारत मुख़्तसर, क़ासिद  भी घबरा जाये है मुझ से, 

उधर वो बदगुमानी है, इधर ये नातवानी (कमजोरी) है 
ना पूछा जाये है उससे, न बोला जाये है मुझ से,

सँभलने दे मुझे ऐ नाउम्मीदी, क्या क़यामत है 
कि दामन-ए-ख़याल-ए-यार छूटा जाये है मुझ से,

तकल्लुफ़ बर-तरफ़ (एक तरफ), नज़्ज़ारगी (रूहानियत) में भी सही, लेकिन 
वो देखा जाये, कब ये ज़ुल्म देखा जाये है मुझ से, 

हुए हैं पाँव ही पहले नवर्द-ए-इश्क़ (इश्क की जंग) में ज़ख़्मी 
न भागा जाये है मुझसे, न ठहरा जाये है मुझ से, 

क़यामत है कि होवे मुद्दई (दुश्मन) का हमसफ़र "ग़ालिब"
वो काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझ से


5 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ालिब तो ग़ालिब हैं
    कई दिनों बाद आपने ब्लॉग पे कुछ डाला है.
    बहुत अच्छा, शानदार. बधाई.

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  2. bahut khoob ghazal pesh ki hai aapne 'ghaalib' ke khazane se! shukriya

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  3. मैं समझ गयी . मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है ग़ालिब को पढ़कर.आपने तो अर्थ के साथ जो लिखा है .समझ में आ गयी . शुक्रिया

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  4. छा गए गुरू।मिर्जा गालिब शाहब के बारे में अच्छी जानकारी देने के लिए धन्यवाद। कभी मेरे पोस्ट पर भी तशरीफ रखिए।

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  5. bhut hi sarthak kosish ki hai apne mirjagalib ji ki itni acchi gazle jo ki apne ek blog ke jariye ham pahuchai hai... nayab kosish hai... apke sare hi blog bhut acche hai main sabhi ko join karungi...

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...